शास्त्री एवं आचार्य उपाधि
आचार्य संस्कृत महाविद्यालय
पुराने अर्थ में संस्कृत महाविद्यालय — शास्त्री तीन वर्ष में, आचार्य दो वर्ष में।
एक लंबी परंपरा
अनादि काल से भारत ज्ञान की उपासना का केंद्र रहा है। ऋग्वेद मानव के पुस्तकालय की सर्वप्रथम पुस्तक है, और वैदिक परंपरा से ही उपनिषद्, अष्टादश पुराण, वेदांग, योग और तंत्र, षड्दर्शन, रामायण और महाभारत तथा ललित एवं नीति काव्य का अमूल्य वाङ्मय निकला — सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय।
यह वाङ्मय इसीलिए टिका रहा क्योंकि सहस्राब्दियों तक गुरुकुलों और ऋषिकुलों में इसका अध्यापन निरंतर होता रहा। यह महाविद्यालय उसी परंपरा में खड़ा है।
विश्वविद्यालय
उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, केरल और आंध्र प्रदेश में संस्कृत विश्वविद्यालय वर्षों से चल रहे थे। राजस्थान का बाद में आया — अधिनियम को २ सितंबर १९९८ को अनुमति मिली, और ६ फरवरी २००१ को विश्वविद्यालय ने मूर्त रूप लिया, जिसके प्रथम कुलपति पद्मश्री डॉ. मंडन मिश्र नियुक्त हुए। २७ जून २००५ को इसका नाम जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर कर दिया गया।
क्या पढ़ाया जाता है
महाविद्यालय शास्त्री त्रिवर्षीय उपाधि और आचार्य द्विवर्षीय स्नातकोत्तर उपाधि पारंपरिक विषयों में चलाता है — चारों वेद: ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद; साथ ही साहित्य, नव व्याकरण, ज्योतिष (गणित और फलित दोनों), धर्मशास्त्र तथा दर्शन (सामान्य और न्याय)।
शास्त्री स्तर पर आधुनिक विषय भी पढ़ाए जाते हैं — हिन्दी साहित्य, अंग्रेज़ी साहित्य, राजनीति विज्ञान और इतिहास।
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आचार्य संस्कृत महाविद्यालय
Next to Main Water Tank, Ramlila GroundLaxmangarh, Sikar, Rajasthan — 332311
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